वसन्त ऋतु का संबंध होली के साथ
वसन्त के मौसम में शरीर में कुछ विशेष त्रिदोष अवस्था होती है जिसके कारण कफ जन्य बुखार, खाँसी – जुखाम व त्वचा पर फुन्सी फोड़े आते हैं।.
इस अवस्था को वापिस स्वस्थता की दिशा व दशा लाने के लिए वसंत में कुछ विशेष आहार व विहार किया जाता है।
जैसे कि कड़वी रस वाली भाजी – जैसे पुनर्नवा व नीम की पत्तों को आहार में लेना ।
दूसरा जितनी भूख है उस से थोड़ा कम भोजन लेना । मीठे से परहेज़ करना।
ठण्डाई – जैसी विशेष द्रव पेय को होली में लेना स्वास्थ्य कारी होता है।
होली में पलाश – के फूलों का पानी उबालकर स्नान करना व इसी का गुलाल बनाना।
पलाश का शर्बत / चाय भी पी सकते हैं जिससे कफ-असंतुलन पुनः संतुलित भी हो सके और फोड़े- फूँसी कम हो जाएं ।
इसके अलावा पोई के फलो को पानी में मसलकर इसके पानी से स्नान (होली का रंग तैयार ) करने से त्रिदोष संतुलन होता है।
पोई की भाजी भी खा सकते हैं।
इनके अलावा नीम, करंज के पत्तियों का सूखा,
गुलाल व उबले पानी से भी फोड़े- फुन्सी समाप्त
होते हैं।



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